Sunday, April 10, 2011

लाखों के जीवन रक्षक उपकरण बने शो-पीस



रूद्रपुर के चिकित्सालय में मशीनों में लगी जंग।

नारायण परगांई। देहरादून। सरकारी अस्पातालों में जीवन रक्षक उपकराणों की उपयोग ना हो पाने के चलते हजारो मरीजों को इसका लाभ नही मिल पा रहा। कांग्रेस शासन काल में खरीदे गए उपकराणों के कारण 1355 मरीजो को चिकित्सा सुविधाओ का लाभ नही मिल पाया जिस कारण दूसरे स्थानो पर जाकर अपना इलाज करवाना पड़ा यही नही अप्रैल 2006 से जुलाई 2009 तक मरीजों को दूर दराज इलाज कराने में भारी परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। मशीनो ंका संचालन ना हो पाने के कारण नौ श्रेणियों की 12 जीवन रक्षक मशीनें 3 वर्ष की वारंटी समाप्त होने के चलते सरकार को करीब 85 लाख की लागत देनेके बाद भी मरीजो को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नही हो सकी। सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 85 लाख की जीवन रक्षक उपकरणों का 4 साल से अधिक समय तक उपयोग ना होने के कारण रोगियों को इसका लाभ नही मिल सका जबकि वर्ष 2002 एवं 03 में सरकार ने चिकित्सा प्र्रबन्ध समीति का गठन किया था जिसका उद्देश्य सरकार से प्राप्त उपकरणों का रखरखाव एवं संचालन करना था। इतना ही नही प्रत्येक 3 माह में एक बार बैठक आयोजित कर पैरामैडिकल स्टाफ की नियुक्ति तथा संविदा पर सेवाओ का प्रबन्ध करने के साथ साथ चिकित्सक व कर्मचारियों के लिए कार्यशालाओ का आयोजन भी करना था लेकिन मुख्यचिकित्सा अधीक्षक जवाहरलाल नेहरू जिला चिकित्सालय रूद्रपुर के कार्यालय की अगस्त 2009 की लेखा परीक्षा के दौरान यह पाया गया कि 85 लाख की 12 जीवन रक्षक मशीने दिसम्बर 2005 से मई 2006 के बीच चिकित्सालय को आपूर्ति की गई थी लेकिन उपकरणो को ना तो स्थापित किया गया और ना ही इनका संचालन किया गया जिस कारण मई 2010 तक चिकित्सालय में यह मशीने बिना उपयोग के ही पड़ी हुई थी यहां तक कि संविदा पर कर्मचारियो व मैडिकल सटाफ को लेने तक कि कोशिश नही की गई और विशेषज्ञों की नियुक्ति भी ना होने के व चलते इन सेवाओ का लाभ मरीजों को नही मिल सका। रिपोर्ट में गठन के उद्दश्यों की अनदेखी करने एवं सरकार के निर्देशों की अवहेलना करने के फलस्वरूप सामान्य जनता को 85 लाख की जीवन रक्षक मशीनो के उपलब्ध होने के बाद भी इसका लाभ नही मिल सका। जबकि मशीनोे के उपयोग ना करने के कारण परिचालन की स्थिति समय व्यतीत होने के साथ साथ वारंटी अवधि समाप्त हो जाने के कारण खराब हो रही थी। दिसम्बर 2009 में मुख्य चिकित्सक ने स्वीकार किया कि जगह की कमी तकनिशियनों की कमी के कारण उपकरणोे की स्थापना नही की जा सकी। और अध्यक्ष सहित सभी सदस्यों की एक साथ उपलब्धता ना होने कारण बैठक भी संचालित नही की जा सकी प्रबंधन के उदासीन रवैये के कारण निष्क्रिय पड़े उपकरणें से उद्देश्यों की पूर्ति नही हो सकी जिस कारण उपकरणोे से मरीज लाभान्वित नही हुए। उपप्रकरण शासन को मई 2010 में भेजा गया था जिस पर अभी तक कोई कार्यवाही नही हो पायी है। कुल मिलाकर लाखों रूपये के खरीदे गए उपकरणो का लाभ रूद्रपुर की जनता को नही मिल पाया है। अधिकारियो की लापरवाही के कारण जहां सरकार के पैसे का नुकसान हुआ हेै वही चिकित्सा विभाग भी इसे सुचारू करने में फिसड्डी साबित हुआ है। इस बारे में जब रूद्रपुर के सीएमएस जे सी दुर्गापाल से बात की गई तो साफ कहना था कि स्टाफ की नियुक्ति ना हो पाने के कारण मशीनों ा संचालन नही हो पा रहा है और पूरा मामला शासन के संज्ञान में है।

Thursday, April 7, 2011

कंग्रेस पर यशपाल आर्या का हंटर।

कंग्रेस पर यशपाल आर्या का हंटर।

प्रभारी के साथ चुनावी एजेन्डा होगा तैयार।

नारायण परगाई। देहरादून। विधान सभा चुनाव 2012 को देखते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्या ने कांग्रेस के नटबोर्ड कसने शुरू कर दिए हैं। अनुशासनहीनात करने वाले कार्यकर्ताओ के खिलाफ शिकायत सही मिली तो पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार के सत्ता में होने के बाद कांग्रेस का पूरा जोर 2012 के विधान सभा चुनाव को फतह करने का है जिसके लिए उत्तराखण्ड में पहली बार प्रदेश  प्रभारी डा.वीरेन्द्र सिंह कांग्रेस विधायको के साथ साथ पार्टी के पदाधिकारियों की बैठक में आगामी 10 अर्पेल को संगठन की रणनीति के साथ साथ 2012 के विधान सभा चुनाव का एजेन्डा भी तय करेंगे। बैठक में उत्तराखण्ड के कुमाउ व गड़वाल में दो बड़ी रैलिया आयोजित कर उत्त्राखण्ड की भाजपा सरकार के खिलाफ चुनावी बिगुल भी फूंका जाएगा और दानो ही रैलियों को कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा सोनिया गांधी के साथ साथ गड़े कांग्रे्रसी दिग्गज कार्यकर्ताओ के बीच अपने गुरू मंत्र देंगे। इसके अलावा पहली बार कांग्रेस की होने वाली बैठक में तय होगा कि आगामी होने वाले विधान सभा चुनाव का खाका किस तरह तैयार किया जाए और किस  तरह सत्ता में पुनः वापसी की जा सके। लोकसभा चुनाव में पांचों सीटे जीतकर कांग्रेस ने जिस तरह भाजपा सरकार को करारा णटका दिया था उसी की तर्ज पर विधान सभा चुनाव में भी  एक बार फिर पूरी ताकत णेंकर इसका एहसास कराया जाएगा।बैठक को इसलिए भी महत्पूर्ण माना जा रहा है कि उत्त्राखण्ड का प्रदेश प्रभारी बनने के बाद श्री सिंह की यह उत्तराखण्ड में पहली बैठक होगी जबकि इससे पूर्व दिल्ली में एक बैठक आयोजित की जा चुकी है। बैठे कमें ऐसे कार्यकर्ता जिन्हांेने कांग्रेस में रहकर अनुशासन हीनता की है उन पर भी अनुशासन का डंडा जोरदार तरीके से चलेगा और संगठन की खामियों को भी दूर किया जाएगा। इसके अलावा कांग्रेस 25 अपैल या मई में सत्याग्रह आन्दोलन शुरू करने के साथ साथ सरकार के खिलाफ बड़ा बिगुल बजाएगी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल की छवि कार्यकर्ताओ के बीच एवं प्रशासनिक अमलों में बेहद सीधी समझाी जाती ळै लेकिन अब आम जनता के बीच वह एक कड़क प्रदेश अध्यक्ष के रूप् में सामने आयेगे।  2007 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में नही आ सकी थी और जनता ने भाजपा को बेहतर मानकर वोट दिया था लेकिन कांग्रेस की नजर में भाजपा सरकार का उत्तराखण्ड में चार साल से अधिक का समय पूरी तरह निराशाजनक रहा है और प्रदेश अध्यक्ष 2012 के विधान सभा चुनाव कररीब आने की हलचल के साथ जनता के बीच कांग्रेस की  छवि को निखारने के लिए कड़क मिजाज के रूप में तैयार हो गए हैं। कांग्रेस में परिवारवाद को लेकर भी कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं लेकिन उनकी  नाराजगी अभी तक खुलकर सामने नही आ सकी है इसलिए इस नाराजगी को भी शांत करने का खाका तैयार कर लिया गया है। ब्रहमण नेताओ को एकजुट करने के साथ साथ ठाकुर वोटो के साथ साथ मुस्लिम व दलित वोटो पर भ्ज्ञी कांग्रेस ने अपने ध्यान लगाना तेज कर दिया है। और जनता के बीच मौजूदा भाजपा सरकार की कई खामियों को लेकर कांग्रेस जाने का मन बना चुकी  है। सदन के भीतर भी कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने का भरसक प्रयास किया है और विकास कार्याें में कांग्रेसी विधायको के क्षेत्रों में पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाने को लेकर भी जोरदार तरीके से उठाया गया है।  आगामी 10 अप्रैल को प्रदेश प्रभारी के दौरो को लेकर कांग्रेसी नेताओ के बीच हलचल तेज हो गई है और अपने अपने क्षेत्रो ंमें जनाधार रखने वाले कांग्रेसी नेता अपनी ताकत का एहसास कराने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए है। टिकट के कई नए दावेदार भी अपने आकाओ की परिक्रमस करने में जुट गए है। कुुल मिलाकर संगठन की दुष्टि से कांग्रेस की आगामी 10 अप्रैल को होने वाली बैठक बेहद महत्वपूर्ण होगी जिसमे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्या एक कड़क प्रदेश अध्यक्ष के रूप् में नजर आयेंगे।

Wednesday, February 23, 2011

राजनीति के क्षेत्र में नौसखिया ही हैं। रामदेव

राजनीति में स्थापित होने को आतुर बाबा रामदेव काला धन, भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों पर बयानबाजी के जरिए राजनीतिक गलियारों में चर्चित तो हो रहे हैं लेकिन इससे योग गुरु के रूप में स्थापित उनकी प्रतिष्ठा को खासा आघात पहुंच रहा है। आज देश की जो राजनीतिक स्थिति है उसमें वह कोई बड़ा बदलाव कर पाएंगे इसमें शंका ही है क्योंकि पूर्व में उनसे भी बड़े दो संत करपात्रीजी महाराज और बाबा जयगुरुदेव ऐसा करने के प्रयास में अपना सब कुछ गंवा चुके हैं। इतिहास गवाह है कि जिन संतों और साधुओं ने राजनीति में प्रवेश किया उन्हें क्षणिक सत्ता सुख भले मिल गया हो लेकिन संत के रूप में कमाई गई उनकी इज्जत कम हो गई। राजनीतिक पार्टियों ने साधु संतों का इस्तेमाल कर उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। चाहे स्वामी चिन्मयानंद हों, रामविलास वेदांती हों, योगी आदित्यनाथ हों अथवा सतपाल महाराज। इन सभी ने जब राजनीति में प्रवेश नहीं किया था तो जनता की इनमें आस्था थी लेकिन राजनीति में कदम रखते ही यह भी अन्य राजनीतिज्ञों की तरह हो गये जिससे इनके प्रति लोगों में विश्वास कम हुआ। जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि राजनीति में प्रवेश की बजाय संतों और धर्मात्मा लोगों को सामाजिक क्षेत्र में ही सक्रिय रहना चाहिए, राजनीति में उनका मार्गदर्शन जरूर रहे लेकिन वह नेतृत्व करने से बचें तो ज्यादा सही रहेगा।

राजनीति के लिए अपने को ‘योग्य’ मान रहे योग गुरु बाबा रामदेव राजनीतिक दावपेंचों को भी प्राणायाम तथा कपालभाति की तरह सरल मानकर जिस राह पर चलने का प्रयास कर रहे हैं वह अंततः उनको अपयश ही प्रदान करेगी। रामदेव ने देश की राजनीति में शुद्धता लाने के लिए ऐलान किया है कि वह लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों में साफ छवि वाले लोगों को अपनी पार्टी के टिकट पर चुनावी मैदान में उतारेंगे। इसके लिए बाबा ने बाकायदा अपने योग प्रशिक्षण शिविरों में योग शिक्षा के साथ-साथ राजनीतिक प्रवचन भी देने शुरू कर दिए हैं। इन प्रवचनों में अकसर निशाना नेहरू-गांधी परिवार होता है। इसी कारण रामदेव अब सीधे कांग्रेस के निशाने पर आ गये हैं। वह जिस काला धन के मुद्दे पर सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं अब वही मुद्दा उनके गले की फांस बन गया है और कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह ने रामदेव से कहा है कि उन्हें अपने ट्रस्ट, आश्रम और अपनी संपत्तियों की अपार वृद्धि के बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए।

बहुत तेजी से अरबों रुपए की संपत्ति के स्वामी बने रामदेव हालांकि यह कहते हैं कि उनकी कोई निजी संपत्ति नहीं है। लेकिन यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि उनका दिव्य योग ट्रस्ट सालाना करोड़ों रुपए कमा रहा है। 2007 में तहलका पत्रिका ने गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट को आधार बनाते हुए यह खुलासा कर सभी को चैंका दिया था कि रामदेव की सालाना आमदनी 400 करोड़ रुपए है। वैसे यह आमदनी हो भी क्यों न? आखिर रामदेव अपने योग शिविर में टिकट लगाते हैं जिसकी एवज में उन्हें कोई कर भी नहीं देना होता। साथ ही उनकी दिव्य फार्मेसी विभिन्न औषधियों का निर्माण कर भी भारी मुनाफा अर्जित करती है। यही नहीं मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कुछ टीवी चैनलों में भी बाबा रामदेव की कथित हिस्सेदारी बताई जाती है। रामदेव के हरिद्वार स्थित आश्रम में भी किसी का मुफ्त इलाज नहीं होता और इसके लिए लोगों को हजारों रुपए में शुल्क अदा करना पड़ता है। बाबा रामदेव पर कई राज्यों में मूल्यवान जमीन कौड़ियों के भाव लेने के आरोप भी लगते रहे हैं। यही नहीं बाबा के पास स्काॅटलेंड में एक आइसलेंड भी बताया जाता है जिसकी कीमत 2 मिलिय्ान पौंड है।

पंूजीपतियों का विरोध करने वाले रामदेव अप्रत्यक्ष रूप से खुद भी पूंजीपति ही हैं। यह सही है कि उन्होंने योग को देश-विदेश में विख्यात कर लोगों के इससे होने वाले लाभ से परिचित कराया लेकिन यह भी सही है कि रामदेव ने योग की मार्केटिंग कर खुद को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया। योग गुरु के रूप में देश विदेश में विख्यात हुए रामदेव जल्द ही ऐसे व्यक्ति बन गए जिसके एक इशारे पर दर्जनों मुख्यमंत्री उनके कार्यक्रम में शरीक होने लगे साथ ही अपने शिविरों में उमड़ती भीड़ की संख्या देखकर वे इतने गदगद हुए कि उन्हें योग सीखने आने वाले लोगों के रूप में वोटर दिखाई देने लगे और बाबा के मन में राजनीति में आने की इच्छा जागी। समस्याएं कहां नहीं होतीं? भारत में भी हैं, उन्हीं का हवाला देते हुए रामदेव ने लोगों को अपने राजनीतिक विचारों से अवगत कराना शुरू कर दिया। जिससे कांग्रेसी मुख्यमंत्री उनसे दूर हुए साथ ही भाजपा ने भी उन्हें अपने लिए खतरा जान उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी। क्षेत्रीय और वामपंथी दल वैसे भी उन्हें ज्यादा महत्व नहीं देते इसलिए रामदेव ने अपना ही राजनीतिक दल बनाने की सोची और आज ऐसा कर वे किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूकते।

लेकिन रामदेव शायद भूल गए हैं कि उनके पास जो भीड़ जुट रही है वह दरअसल उनके वोटर नहीं बल्कि अपने स्वास्थ्य लाभ के लिए आए लोग हैं जो शायद ही उनके राजनीतिक विचारों से इत्तेफाक रखते हों। यदि जुटने वाली भीड़ संबंधित व्यक्ति के पक्ष में वोट डालती तो शायद ही कोई नेता चुनाव हारता। कल को कोई डाॅक्टर भी अपने यहां जुटने वाली भीड़ की संख्या देख कर चुनावों में उतरने का फैसला ले ले तो इसे सरासर बेवकूफी ही कहा जाएगा। रामदेव चाहे जितने बड़े योग गुरु हों लेकिन उनका राजनीतिक आधार कुछ भी नहीं है। यदि उन्होंने योग को लोकप्रिय बनाने की बजाए अब तक की अपनी मेहनत राजनीति के क्षेत्र में लगाई होती तो शायद उनका कुछ जनाधार हो भी जाता। उन्हें भाजपा से जुड़े संतों के राजनीतिक हश्र पर भी निगाह घुमा लेनी चाहिए।

यदि रामदेव हिन्दू वोटों के सहारे अपना बेड़ा पार लगाना चाहते हैं तो उन्हें यह भी देख लेना चाहिए कि यह नीति तो अथक प्रयासों के बाद भाजपा की भी सफल नहीं रही ऐसे में वह तो राजनीति के क्षेत्र में नौसखिया ही हैं। राजनीति का क्षेत्र रामदेव जी के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि यहां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप में जिस भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, वह उनके जैसे प्रबुद्ध और लोकप्रिय भारतीय नागरिक के लिए कष्टदायी होगा। राजनीति का क्षेत्र काजल की कोठरी है, यह बात उन्हें अब तक समझ आ ही गई होगी क्योंकि रामदेव का दामन भले कितना साफ हो लेकिन यहां मुख्यधारा में प्रवेश करने के साथ ही वह भी आरोपों के घेरे में आ गए हैं जिससे उनकी साफ छवि पर भी सवालिया निशान लग गया है। इसके अलावा हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में एक कांग्रेस सांसद ने कथित तौर पर उन्हें सार्वजनिक रूप से अपशब्द कहे।

कुछ समय पहले मीडिया में रामदेव के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने की खबर भी चली थी। लेकिन रामकिशन यादव उर्फ रामदेव यदि यह सपना ले भी रहे हैं तो जनता जानना चाहेगी कि किस आधार पर? सामाजिक क्षेत्र में, उन्होंने यह सही है कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने में बड़ी भूमिका निभाई लेकिन इसके लिए उन्होंने फीस भी वसूली। अध्यात्म के क्षेत्र में उनका कोई योगदान नहीं है। राजनीति के क्षेत्र में वह बिल्कुल नए हैं और शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की शैक्षणिक योग्यता के आगे कहीं नहीं टिकते। मनमोहन सिंह के पास जहां देश विदेश की कई डिग्रियां हैं वहीं रामदेव ने हरियाणा के एक गांव स्थित स्कूल में आठवीं तक की कक्षा पास की और उसके बाद एक गुरुकुल में योग और संस्कृत की शिक्षा ली।09837261570

तेलंगानाः कांग्रेस सांसदों ने दी आत्महत्या की धमकी

तेलंगाना क्षेत्र के आंद¨लनकारी कांग्रेस सांसद¨ं ने आज धमकी दी कि अगर अलग राज्य्ा की उनकी मांग नहीं मानी गई त¨ वे संसद भवन परिसर में आत्महत्य्ाा कर लेंगे। उन्ह¨ंने कहा कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री के वक्तव्य्ा देने तक वे संसद क¨ नहीं चलने देंगे। सांसद¨ं के आंद¨लन से भ©ंचक विधि मंत्री एम वीरप्पा म¨इली ने आज कहा कि उन्हें ‘टकराव‘ की बजाय्ा ‘विश्वास‘ का माह©ल तैय्ाार करना चाहिए ताकि इस बात क¨ सुनिश्चित किय्ाा जा सके कि मुद्दे का समाधान निकले। उन्ह¨ंने ज¨र दिय्ाा कि आंध्र प्रदेश विधानसभा से उचित प्रक्रिय्ाा शुरू की जानी चाहिए। हैदराबाद से कांग्रेस सांसद एस सत्य्ानाराय्ाण ने संवाददाताअ¨ं से कहा, ‘‘अलग तेलंगाना राज्य्ा के लिए अनेक ल¨ग अपनी जान दे रहे हैं। हम अपनी य्ाह मांग नहीं छ¨ड़ेंगे। हमारे ल¨ग अपने प्राण न्य्ा¨छावर करते रहेंगे अ©र अगर मांगें नहीं पूरी की गईं त¨ हम संसद में आत्महत्य्ाा करेंगे।‘‘ आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र के 11 सांसद¨ं के प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी अ©र संसदीय्ा कायर््ा मंत्री पवन कुमार बंसल से मुलाकात की अ©र इस बात पर ज¨र दिय्ाा कि उनकी मांगें मानी जाएं।

सत्य्ानाराय्ाण ने कहा, ‘‘अनेक ल¨ग¨ं ने जब पाय्ाा कि कांग्रेस कुछ नहीं कर रही है त¨ उन्ह¨ंने आत्महत्य्ाा की। श्रीकृष्णा समिति अपनी रिप¨र्ट दे चुकी है इसके बावजूद आज भी राष्ट्रपति के अभिभाषण में इसका उल्लेख नहीं किय्ाा गय्ाा है। य्ाह बेहद निराशाजनक है। ल¨ग महसूस करते हैं कि संप्रग तेलंगाना के बारे में गंभीर नहीं है।‘‘ आंद¨लनकारी सांसद¨ं ने कहा कि इस गंभीर मुद्दे पर उनका आंद¨लन कई वषर्¨ं से चल रहा है अ©र अनेक ल¨ग¨ं ने इसके लिए अपने प्राण¨ं की आहुति दी है। सत्य्ानाराय्ाण ने कहा, ‘‘2जी स्पेक्ट्रम जिसे अनेक ल¨ग नहीं समझते हैं अ©र जिसके लिए किसी ने भी अपने प्राण¨ं की आहुति नहीं दी है उसके बारे में प्रधानमंत्री ने जेपीसी के गठन क¨ लेकर वक्तव्य्ा दिय्ाा।‘‘ उन्ह¨ंने मांग की कि प्रधानमंत्री क¨ उसी तर्ज पर तेलंगाना के मुद्दे पर भी बय्ाान देना चाहिए। सांसद ने कहा, ‘‘9 दिसंबर 2009 क¨ सरकार ने नीतिगत वक्तव्य्ा दिय्ाा था कि तेलंगाना के गठन के लिए एक प्रस्ताव पेश किय्ाा जाएगा। लेकिन उसके बाद वे (सरकार) अपने वादे से पीछे हट गए।‘‘ सूत्र¨ं ने कहा कि सरकार तेलंगाना क्षेत्र के कांग्रेस सांसद¨ं की अ¨र से संसद की कायर््ावाही बाधित किए जाने से आश्चयर््ाचकित है। संसद क¨ चलने देने का तरीका ढूंढने के लिए प्रय्ाास किए जा रहे हैं।

म¨इली ने ज¨र दिय्ाा कि नए राज्य्ा के गठन के लिए पहले आंध्र प्रदेश विधानसभा से एक प्रस्ताव पास किय्ाा जाना चाहिए अ©र आंद¨लनकारी सांसद¨ं क¨ इस तरह के काम के लिए प्रक्रिय्ाा का पालन करना चाहिए। म¨इली ने कहा, ‘‘कैसे (इस तरीके से) तेलंगाना का गठन किय्ाा जा सकता है। एक प्रक्रिय्ाा है। विधेय्ाक क¨ संसद में तब तक पेश नहीं किय्ाा जा सकता है जब तक कि विधानसभा इसे पारित नहीं कर देती। हमें एक ऐसा माह©ल तैय्ाार करना है जिसे टकराव से तैय्ाार नहीं किय्ाा जा सकता। इसे विश्वास के जरिए तैय्ाार किय्ाा जाना है।‘‘ सरकार कथित त©र पर आंद¨लनकारी सांसद¨ं क¨ शांत करने के उपाय्ा तलाश रही है ताकि संसद सामान्य्ा रूप से चल सके। म¨इली ने कहा कि इन सांसद¨ं की कार्रवाई ज्य्ाादा गलतफहमी पैदा करेगी अ©र उन्ह¨ंने ज¨र दिय्ाा कि सöावपूर्ण तरीके से समाधान ढूंढा जाना चाहिए।09837261570

Monday, February 21, 2011

पुलिस में गुटबाजी से बदमाशों के हौसले बुलंद

पुलिस में गुटबाजी से बदमाशों के हौसले बुलंद
देहरादून।
राजधनी दून में पुलिस बदमाशों को पकडने के बजाए गुटबाजी में उलझती जा रही है। जिस कारण आम जनता पुलिस के दरबार में अपनी पफरियाद सुनाती हुई नजर आ रही है पिछले कापफी समय से राजधनी दून में गुटबाजी की मार झेल रही पुलिस बदमाशों को पूरी तरह खूली छूट दे रही है गुटबाजी के कारण ही एक दूसरे को नीचा दिखाने के चलते बदमाशों के हौसले भी बढ़ते नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों राजधनी दून में हुए शूटआउट के पीछे भी पुलिस की गुटबाजी भी देखने को मिली। अपने-अपने थाना क्षेत्रों में अपराधें को रोकने के बजाए पुलिस के दरोगा व कई बडे़ अध्किारी जहां पूरी तरह विपफल साबित हुए हैं वहीं कई मामलों में पुलिस के आला अध्किारियों तक को हस्ताक्षेप करना पड़ा है। बडे़ अध्किारियों के हस्ताक्षेप करने के बाद यह बात भी उजागर हो गई है कि पुलिस के दरोगा अपनी कार्य प्रणाली ठीक ढंग से नहीं निभा पा रहे हैं। जिसके चलते थाना क्षेत्रों में जनता को मिलने वाला न्याय भी पफरियाद लेकर आने वाले पफरियादी को नहीं मिल पा रहा है। एक तरपफ तो पुलिस मित्राता सुरक्षा का दावा करती हुई नजर आती है वहीं दूसरी तरपफ पुलिस के कई दरोगा थाना क्षेत्रों से ही मामलों को रपफा-दपफा करने का खेल खेलते नजर आ रहे हैं।
बीती रात थाना डालनवाला क्षेत्रा के अन्तर्गत सचिवालय के ठीक सामने हुई मारपीट व कातिलाना हमले में आध दर्जन लोगों ने एक व्यक्ति को चाकू व अन्य हथियारों से मौत के घाट उतारने का प्रयास किया लेकिन मौके पर पहुंची पुलिस ने उन्हें पकडने के बजाए रपफा-दपफा कर डाला। मौके से एक व्यक्ति को ही पकड़ कर थाना डालनवाला ले जाया गया लेकिन उसके अन्य साथियों को पुलिस नहीं पकड़ सकी जबकि करनपुर चैकी इंचार्ज उसके अन्य साथियों को पकडने के लिए उस स्थान पर गये थे जहां वे रूके हुए थे। लेकिन पुलिस उन्हें पकडने का साहस इसलिए नहीं जुटा सकी क्योंकि इस मामले में एक साहब की संलिप्ता मौजूद थी और साहब का लगातार थाना डालनवाला इंस्पेक्टर को पफोन पर आरोपियों को न पकडने की बात कहता रहा। अति संवेदनशील माने जाने वाले सचिवालय व पुलिस मुख्यालय के पास घटी घटना ने यह बात साबित कर दी की पुलिस के कुछ लोग इस तरह की घटनाओं को थाने से ही रपफा-दपफा करने का खेल खेलते नजर आ रहे हैं।
एक तरपफ तो पीड़ित को न्याय दिलाने की बात की जाती है लेकिन पुलिस के यह दावे पूरी तरह खोखले नजर आ रहे हैं। लगातार बढ़ रही इन घटनाओं में पुलिस हियूमन राईट्स का भी खुला उल्लंघन किया जा रहा है अगर प्रदेश में पुलिस से हियूमन राईट्स के बारे में जानकारी ली जाये तो चंद लोगों को ही इस बारे में बारिकी ज्ञान होगा। बदमाशों पर नकेल कसने की बात कहने वाले पुलिस के आला अध्किारी अब पूरी तरह खामोश होकर बैठ गये हैं और गुटबाजी का खेल इस तरह खेला जा रहा है जिससे पुलिस की छवि आपस में ही दागदार बन बैठी है। यहां तक की एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए आपस में ही मनमुटाव की बाते भी बढ़ती जा रही है जो उत्तराखण्ड की मित्रा पुलिस के लिए ठीक संकेत नहीं है। अगर समय रहते इस गुटबाजी को नहीं रोका गया तो बदमाश कुछ पुलिस अध्किारियों से सैटिंग कर सरेआम खूनी होली खेलते नजर आयेंगे।09837261570

पुलिस की कब्र खोदने की तैयारी!

पुलिस की कब्र खोदने की तैयारी!
देहरादून।
उत्तराखण्ड शासन के कुछ अध्किारी पूरे पुलिस विभाग की कब्र खोदने की तैयारी में जुट गये हैं वह पुलिस अध्किारियों के बीच नपफरत का जो बीज बोने के मिशन में लगे हुए हैं अगर उस मिशन को उत्तर प्रदेश की तर्ज पर इस राज्य में अंजाम दे दिया गया तो पुलिस विभाग में विद्रोह की आग कभी भी भड़क उठेगी जिसकी लपटों से पूरा पुलिस महकमा सुलग जायेगा। सवाल उठ रहा है कि नये व पुराने पुलिस कप्तानों से जिस तरह बडे जिले छीनकर उनके स्थान पर डीआईजी स्तर के अधिकारियों को बिठाने का तानाबाना बुना जा रहा है वह राज्य में बगावत की चिंगारी सुलगाने की तरपफ इशारा करता है। नये व पुराने आईपीएस अब शासन के होने वाले निर्णय पर अपनी निगाहें जमाये हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि शासन के कुछ अध्किारी प्रदेश पुलिस की कब्र खोदने के लिए ऐसी योजना बनाने के मिशन में जुटे हुए हैं जिससे कि पुलिस महकमें में कभी भी विद्रोह की ज्वाला भड़क सकती है। देखने में आ रहा है कि जब से कुछ बडे जिलो में रैंकर आईपीएस अध्किारियेां की तैनाती हुई है वह शासन के कुछ अध्किारियों की आंखों में लगातार खटक रही है। इसी के चलते उन्होंने इन बडे जिलों से रैंकर आईपीएस अध्किारियेां को हटवाने के लिए गुप्त रूप से तानाबाना बुन लिया है इसी कडी के चलते उन्होंने यह योजना तैयार की है कि तीन बडे जिलों, दून, हरिद्वार व उध्मसिंह नगर में डीआईजी रैंक के अध्किारियेां को तैनाती दे दी जाये। इस योजना को जो चंद अधिकारी अमलीजामा पहनाने के मिशन में लगे हुए हैं वह इस छोटे से राज्य के लिए कापफी घातक हो सकता है। शासन के यह चंद अध्किारी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखण्ड में भी कुछ बडे जिलों केा डीआईजी के हवाले करने का जो तानाबाना बुन रहे हैं उससे पुलिस के छोटे अध्किारियों में एक विद्रोह की भावना देखने केा अभी से मिलने लगी है। भले ही यह योजना अभी कागजों में चल रही हो लेकिन जिस तेजी के साथ इस योजना का पूरे राज्य के अन्दर प्रचार हुआ है वह कहीं न कहीं पुलिस विभाग की कब्र खेादने की तैयारी की ओर इशारा कर रहा है। पुलिस महकमें में यहां तक चर्चाएं हैं कि दून में संजय गुज्याल को डीआईजी के पद पर आसीन करने की कवायद की जा रही है तथा अब तक एसटीएपफ में एसएसपी के पद पर तैनात रहे डीआईजी अमित सिन्हा को हरिद्वार का डीआईजी बनाये जाने पर भी तेजी से मंथन शासन में बैठे कुछ अध्किारी करने में लगे हुए हैं। वहीं कई जिलों में पुलिस कप्तान की बागडोर संभाल चुके डीआईजी अभिनव कुमार को उध्मसिंह नगर का डीआईजी बनाये जाने के लिए भी मंथन शासन में बैठे चंद अध्किारी करने में जुटे हुए हैं। हालांकि अभी इस बात की भनक नहंी लग पाई है कि जिन अध्किारियेां को बडे जिलों में डीआईजी के पद पर भेजने के लिए मंथन चल रहा है उन्होंने शासन में बैठे कुछ अध्किारियों की इस कार्यवाही का समर्थन किया है या नहीं?
शासन में बैठे कुछ अध्किारी जिस तरह से पुराने व नये आईपीएसों के साथ भेदभाव करने का खाका तैयार करने में जुटे हुए हैं वह इस राज्य के लिए कापफी खतरनाक साबित हो सकता है। राज्य में आये कुछ नये आईपीएस व रैंेकर पुलिस कप्तानों में इस योजना को लेकर हालांकि अभी विद्रोह की भावना देखने को नहंी मिल रही है लेकिन पीपीएस रैंक के कई अध्किारियेां का सापफ कहना है कि अगर इस राज्य में एसएसपी के स्थान पर डीआईजी को जनपदों में तैनात करना है तो प्रदेश के सभी पीपीएस अध्किारियों को बर्खास्त करके घर भेज देना चाहिए क्योंकि जिस तरह से इस राज्य में उत्तर प्रदेश की परिपार्टी अपनाने के लिए शासन के कुछ अध्किारी खेल खेलने के मिशन में जुटे हुए हैं उन्होंने अगर अपनी इस योजना को अमलीजामा पहनाने का सपना पूरा किया तो यह तय है कि वह भी किसी कीमत पर चुप बैठने वाले नहीं हैं। पुलिस मुख्यालय में बैठे कुछ बडे अधिकारियेां का कहना है कि शासन के जो चंद अध्किारी बडे जिलों में डीआईजी को बैठाने के लिए रणनीति बना रहे हैं उससे आने वाले समय में पुलिस के अन्दर विद्रोह की चिंगारी भड़क जायेगी जो कि इस शांतप्रिय प्रदेश के लिए खतरनाक साबित होगी।

Friday, February 11, 2011

कंग्रेस के विभीशण तिवारी ने भाजपा को दिए गुरूमंत्र

भाजपाई रैली में तिवारी की मौजूदगी से कांग्रेसी धराषाही

नारायण परगांई
 देहरादून। नितिन गडकरी की रैली से षुरू हुआ भाजपा का चुनावी श्रीगणेष कांग्रेस के विभीशण कहे जाने वाले तिवारी की मौजूदगी से राजनैतिक गति पकड़ गया है। तिवारी की भाजपा की रैली में मौजूदगी ने जहां प्रदेष की राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है वहीं कांग्रेसी एनडी तिवारी की इस हरकत से सकते में आ गए हैं। आगामी विधनसभा चुनाव को देखते हुए तिवारी के इस कदम को कांग्रेस के लिए  बेहद खतरनाक माना जा रहा है। प्रदेष के विकास पुरूश कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्राी एनडी तिवारी ने बीते दिवस देहरादून के गांध्ी पार्क में भाजपा की अटल खाद्यान योजना को देष के लिए अच्छा कदम बताने के साथ-साथ इसे उत्तराखंडके लिए भी महत्वपूर्ण बताने की बात खुले मंच से भाजपा के हजारों कार्यकर्ताओं के बीच कह डाली थी जिसे सुनकर प्रदेष भर के कांग्रेसी नेताओं में हड़कंप मच गया था। यहां तक की प्रदेष की मौजूजा भाजपा सरकार की खुलकर तारीफ करने के बाद खुद भाजपा के राश्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी तिवारी की तारीफ खुले मंच से कर डाली। राजनैतिक हलकों में यह बातें जहां चार्चा का विशय बनी हुई हैं वहीं काग्रेसी नेताओं की नींद भी उड़ गई है। पिछले काफी समय से राज्यपाल पद पर बने रहने के दौरान सैक्स स्कैंडल में नाम सामने आने पर तिवारी से कांग्रेस ने पूरी तरह किनारा कर लिया था। और तभी से तिवारी कांग्रेस में असहज महसूस कर रहे थे। यहां तक की दिल्ली हाई कमान तक ने तिवारी की बात को अनसुना करते हुए उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया था। और राज्यपाल पद से इस्तीपफा देने के बाद तिवारी देहरादून का रूख कर गए थे। जिसके बाद से ही तिवारी अपने को कांग्रेस में असहज महसूस कर रहे थे। पितृत्व मामले में कोर्ट में दाखिल याचिका को लेकर भी तिवारी कांग्रेस से खासे नाराज चल रहे हैं। कोर्ट में तिवारी की डीएनए टेस्ट ना कराने की याचिका को भी खारिज कर दिया गया है। और अब तिवारी के उपर डीएनएटेस्ट कराने की तलवार भी लटकी पड़ी है। उत्तराखंड की राजनीति में तिवारी का कद बेहद उंचा माना जाता है। और तिवारी ने इस बात को पिछले हुए विधनसभा चुनाव में चुनाव प्रचार ना करके इस बात को सााबित भी किया जा चुका है। तिवारी के प्रचार ना करने से कांग्रेस को उत्तराखंड में सत्ता गंवाने का परिणाम भुगतना पड़ा था वहीं अब तिवारी के भाजपा की रैली में षामिल होने के बाद प्रदेष की राजनीति में नए समीकरण बनने तय हो गए हैं। तिवारी के भाजपा की रैली में आ जाने के बाद इसका नुकसान जहां कांग्रेस को 2012 के होने वाले विधनसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है वहीं भाजपा को इसका पफायदा मिलना तय माना जारहा है। तिवारी के अचानक भाजपा की रैली में पहुंचने के पीछे कांग्रेस को बैकपुट पर लाने की कवायद भी समझा जा रहा है लेकिन तिवारी के खास माने जाने वाले कांग्रेस प्रदेष अध्यक्ष यषपाल आर्या पर भी अगुलियां उठनी षुरू हो गई हैं। क्यिोंकि तिवारी को यषपाल आर्या मना पाने में पूरी तरह नाकामयाब षाबित हुए हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भाजपा की रैली में षामिल होने के बाद तिवारी के आवास पर कई कांग्रेसी नेताओं ने डेरा जमा लिया था। लेकिन तिवारी ने सापफ तौर पर कांग्रेसी नेताओं को उनसे दूर रहने की हिदायत दी गई है। कुलमिलाकर उत्तराखंड की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले तिवारी कांग्रेस में हासिए पर चल रहे हैं और नई जमीन तलासने की कवायद में लगे हुए हैं। अगर तिवारी ने भाजपा से हाथ मिला लिया तो उत्तराखंड की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन होना तय माना जा रहा है अपने मुख्यमंत्राी काल के अनुभव का लाभ वह जहां भाजपा को दे सकते हैं वहीं 2012 में पुनः सत्ता में भाजपा की वापसी का कदम भी तैयार कर सकते हैं। एक तरफ जहा भाजपा विकास को आधर बना कर चुनावी युद्ध् में कूद गई है वहीं गरीबों को सस्ता राषन उपलब्ध् कराने की योजना ने भी प्रदेष की गरीब जनता का रूझान भाजपा की ओर मोड़ दिया है। हांलाकि कई कांग्रेसी नेता इस महत्वपूर्ण योजना की आलोचना करते हुए देखे जा रहे हैं लेकिन गरीबजनता इस बातों की तरफ कोई प्रदेष की गरीब जनता का रूझान भाजपा की ओर मोड़ दिया है। हांलाकि कई कांग्रेसी नेता इस महत्वपूर्ण योजना की आलोचना करते हुए देखे जा रहे हैं लेकिन गरीबजनता इस बातों की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही। कुलमिलाकर यह कहा जाए कि कांग्रेस के विभिशण ने भाजपा की रैली में जाकर कल्याणकारी राजा के कदमों को और अध्कि मजबूद कर दिया है। जिसका फायदा निष्चिित रूप् से भाजपा को मिलना तय है। 09837261570